(असत्य, अवज्ञा और अंततः पूर्ण कृपा की कथा)
📜 सूतजी का कथन
सूतजी बोले—
हे मुनिवरों! अब मैं श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा और लीला से युक्त अंतिम अध्याय का वर्णन करता हूँ। आप सभी श्रद्धा और ध्यानपूर्वक इसे सुनिए।
🚢 साधु वैश्य की यात्रा और दण्डी का प्रश्न
साधु वैश्य मंगलाचार करके अपने दामाद सहित अपने नगर की ओर प्रस्थान कर गया। कुछ दूर जाने पर मार्ग में दण्डी वेश धारण किए हुए स्वयं श्री सत्यनारायण भगवान उससे मिले और बोले—
हे साधु! तेरी नाव में क्या भरा हुआ है?
इस पर अभिमानी वैश्य हँसते हुए बोला—
हे दण्डी! आप क्यों पूछते हैं? क्या धन लेने की इच्छा है? मेरी नाव में तो केवल बेल और पत्ते भरे हैं।
⚡ असत्य वचन और भगवान का मौन
साधु के कठोर और असत्य वचनों को सुनकर भगवान बोले—
तुम्हारा वचन सत्य हो।
इतना कहकर दण्डी वहाँ से दूर चले गए और समुद्र के तट पर बैठ गए।
🌊 धन का लोप और वैश्य की मूर्छा
दण्डी के जाने के पश्चात साधु वैश्य ने नित्यकर्म किया और जब उसने नाव को अस्वाभाविक रूप से ऊँचा उठा हुआ देखा, तो आश्चर्य में पड़ गया। नाव के भीतर देखने पर वहाँ धन के स्थान पर केवल बेल और पत्ते देख वह मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा।
मूर्छा खुलने पर वह अत्यंत शोक में डूब गया।
🙏 दामाद की सीख और शरणागति
तब दामाद ने कहा—
आप शोक न करें। यह अवश्य उसी दण्डी का शाप है। अब हमें उन्हीं की शरण में जाना चाहिए, तभी हमारी मनोकामना पूर्ण होगी।
यह सुनकर साधु वैश्य दण्डी के पास गया, भक्तिभाव से उन्हें प्रणाम किया और रोते हुए बोला—
मैंने आपसे जो असत्य और कठोर वचन कहे, उनके लिए मुझे क्षमा करें।
🌺 भगवान का उपदेश और स्वीकारोक्ति
तब दण्डी रूपी भगवान बोले—
हे वणिक पुत्र! मेरी आज्ञा की अवहेलना के कारण तुम्हें बार-बार दुःख प्राप्त हुआ है। तुम मेरी पूजा से विमुख हो गए थे।
साधु ने विनयपूर्वक कहा—
हे प्रभु! आपकी माया से ब्रह्मा आदि देवता भी आपके स्वरूप को नहीं जान पाते, तो मैं अज्ञानी कैसे पहचान सकता हूँ। अब आप प्रसन्न होइए। मैं सामर्थ्य अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मेरी रक्षा कीजिए और मेरी नाव को पूर्ववत धन से भर दीजिए।
✨ भगवान की कृपा और वरदान
साधु के भक्तिपूर्ण वचनों से श्री सत्यनारायण भगवान प्रसन्न हो गए। उन्होंने इच्छानुसार वरदान दिया और अंतर्धान हो गए।
जब ससुर और दामाद नाव पर लौटे तो उन्होंने देखा कि नाव पुनः धन से भर चुकी थी। वहीं उन्होंने अपने साथियों सहित श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और अपने नगर की ओर चल पड़े।
🏡 नगर आगमन और लीलावती का पूजन
नगर के निकट पहुँचकर साधु ने एक दूत को घर सूचना देने भेजा। दूत ने साधु की पत्नी लीलावती को प्रणाम कर बताया कि उनके स्वामी दामाद सहित नगर के समीप आ पहुँचे हैं।
यह सुनकर लीलावती अत्यंत हर्षित हुई। उसने श्रद्धापूर्वक श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और अपनी पुत्री कलावती से कहा कि वह पूजन पूर्ण करके शीघ्र आए।
❌ प्रसाद की अवज्ञा और दैवी लीला
माता के वचनों को सुनकर कलावती उतावलेपन में प्रसाद छोड़े ही अपने पति के पास चली गई।
प्रसाद की अवज्ञा से श्री सत्यनारायण भगवान अप्रसन्न हो गए और नाव सहित उसके पति को जल में डुबो दिया।
जब कलावती को वहाँ अपना पति दिखाई नहीं दिया, तो वह रोती हुई भूमि पर गिर पड़ी।
😢 साधु की करुण पुकार
नाव को डूबा हुआ और पुत्री को विलाप करते देख साधु अत्यंत दुःखी होकर बोला, हे प्रभु! मुझसे और मेरे परिवार से जो भूल हुई है, उसे क्षमा कीजिए।
🔊 आकाशवाणी और समाधान
साधु के दीन वचनों से भगवान प्रसन्न हुए और आकाशवाणी हुई—
हे साधु! तेरी कन्या मेरे प्रसाद को छोड़कर आई है, इसलिए उसका पति अदृश्य हुआ है। यदि वह घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके लौटेगी, तो उसका पति उसे अवश्य प्राप्त होगा।
🌸 पूर्ण श्रद्धा और चमत्कार
आकाशवाणी सुनकर कलावती घर गई, श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया और पुनः लौटने पर अपने पति के दर्शन किए।
इसके पश्चात साधु वैश्य ने अपने समस्त बंधु-बाँधवों सहित विधि-विधान से श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन किया।
🌼 फलश्रुति और मोक्ष
इस लोक में सुख-समृद्धि भोगकर साधु वैश्य अंत में स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ।
📿 चतुर्थ अध्याय की पूर्णता
॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का चतुर्थ अध्याय संपूर्ण ॥
🙏 मंगल स्मरण
श्रीमन्न नारायण – नारायण – नारायण
भज मन नारायण – नारायण – नारायण
श्री सत्यनारायण भगवान की जय!
अगले अध्याय पढ़ें
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – प्रथम अध्याय Shree Satyanarayan Vrat Katha
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – द्वितीय अध्याय Shree Satyanarayan Vrat Katha
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – तृतीय अध्याय Shree Satyanarayan Vrat Katha
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – पंचम अध्याय Shree Satyanarayan Vrat Katha
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