(व्रत की अवहेलना से दुःख और श्रद्धा से कृपा की कथा)
📜 सूतजी का कथन
सूतजी बोले—
हे श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं आगे की पवित्र कथा का वर्णन करता हूँ, आप सभी श्रद्धा से सुनिए।
👑 राजा उल्कामुख का चरित्र और व्रत
प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान और सत्यवक्ता राजा था। वह जितेन्द्रिय था और प्रतिदिन देवस्थानों में जाकर पूजा करता तथा निर्धनों को दान देकर उनके कष्ट दूर करता था। उसकी पत्नी कमल के समान मुख वाली, सती और साध्वी थी।
भद्रशीला नदी के तट पर राजा और रानी ने विधिपूर्वक श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत किया।
🧳 साधु वैश्य का आगमन और जिज्ञासा
उसी समय साधु नाम का एक वैश्य वहाँ आया, जिसके पास व्यापार के लिए बहुत धन था। राजा को व्रत करते देखकर वह विनम्र भाव से बोला—
हे राजन! आप अत्यंत भक्तिभाव से यह कौन-सा कर्म कर रहे हैं? कृपा करके मुझे इसका रहस्य बताइए।
राजा ने उत्तर दिया—
हे साधु! मैं अपने बंधु-बाँधवों सहित पुत्र प्राप्ति की कामना से महाशक्तिमान श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत और पूजन कर रहा हूँ।
🌼 संतान की इच्छा और व्रत का संकल्प
राजा के वचन सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा—
हे राजन! कृपया इस व्रत का पूरा विधान मुझे भी बताइए। मेरी कोई संतान नहीं है, और मुझे पूर्ण विश्वास है कि इस व्रत से मुझे संतान की प्राप्ति होगी।
राजा से विधि सुनकर साधु व्यापार से निवृत्त होकर अपने घर लौट आया।
👩🦰 लीलावती और कलावती का जन्म
साधु ने अपनी पत्नी लीलावती को इस संतानदायक व्रत का महत्व बताया और कहा कि संतान होने पर वह अवश्य यह व्रत करेगा। भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से कुछ समय पश्चात लीलावती गर्भवती हुई और दसवें महीने एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया।
कन्या चंद्रमा की कला की भांति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी, इसलिए माता-पिता ने उसका नाम कलावती रखा।
⏳ व्रत में विलंब और भूल
एक दिन लीलावती ने मधुर वाणी में अपने पति को स्मरण कराया कि आपने जिस व्रत का संकल्प लिया था, अब उसे करने का समय आ गया है।
साधु ने उत्तर दिया—
हे प्रिये! मैं यह व्रत अपनी पुत्री के विवाह के समय करूँगा।
इस प्रकार आश्वासन देकर वह नगर चला गया।
💍 विवाह और व्रत की उपेक्षा
समय आने पर साधु ने अपनी कन्या के लिए योग्य वर खोजा और कंचन नगर से एक सुयोग्य वाणिक पुत्र लाकर उसका विवाह कर दिया। परंतु दुर्भाग्यवश विवाह के बाद भी उसने श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत नहीं किया।
⚡ भगवान का कोप और संकट
इस व्रत की उपेक्षा से भगवान सत्यनारायण अप्रसन्न हो गए और साधु को दुःख भोगने का श्राप मिला।
साधु अपने दामाद के साथ व्यापार हेतु रत्नसारपुर नगर पहुँचा और राजा चन्द्रकेतु के नगर में व्यापार करने लगा।
🏰 मिथ्या आरोप और कारावास
भगवान की माया से एक चोर राजा का धन चुराकर भागा और पीछा होता देख वही धन साधु के ठहरने के स्थान पर रख गया। राजसेवकों ने धन देखकर साधु और उसके दामाद को चोर समझकर बाँध लिया और राजा के सामने प्रस्तुत किया।
राजा की आज्ञा से दोनों को कठोर कारावास में डाल दिया गया और उनका सारा धन छीन लिया गया।
🌑 घर में विपत्ति और कलावती की श्रद्धा
उधर भगवान के श्राप से साधु की पत्नी लीलावती भी अत्यंत दुःखी हुई। घर का शेष धन भी चोर ले गए। भूख-प्यास और मानसिक पीड़ा से व्याकुल कलावती अन्न की खोज में एक ब्राह्मण के घर गई, जहाँ उसने श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा और कथा भी सुनी। प्रसाद ग्रहण कर वह रात्रि में घर लौटी।
🙏 व्रत द्वारा कृपा की याचना
कलावती से सब जानकर लीलावती ने परिवार और बंधुओं सहित श्रद्धापूर्वक श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और विनती की कि मेरे पति और जमाई शीघ्र सकुशल घर लौट आएँ तथा हमारे अपराध क्षमा किए जाएँ।
🌟 भगवान का स्वप्नादेश
भगवान इस व्रत से संतुष्ट हुए और राजा चन्द्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर आज्ञा दी कि उन दोनों वैश्यों को मुक्त करो और उनका धन लौटा दो, अन्यथा तुम्हारा राज्य, धन और संतान नष्ट हो जाएँगे।
🌅 न्याय और सम्मान
प्रातःकाल राजा ने सभा में अपना स्वप्न सुनाया और तुरंत दोनों को कैद से मुक्त कराया। राजा ने मधुर वाणी में उनसे क्षमा माँगी, उन्हें नए वस्त्राभूषण पहनाए और छीने हुए धन से दुगुना धन लौटा दिया।
साधु और उसका दामाद प्रसन्न होकर अपने घर लौट आए।
📿 तृतीय अध्याय की पूर्णता
॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का तृतीय अध्याय संपूर्ण ॥
🙏 मंगल स्मरण
श्रीमन्न नारायण – नारायण – नारायण
भज मन नारायण – नारायण – नारायण
श्री सत्यनारायण भगवान की जय!
अगले अध्याय पढ़ें
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – प्रथम अध्याय Shree Satyanarayan Vrat Katha
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – द्वितीय अध्याय Shree Satyanarayan Vrat Katha
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – चतुर्थ अध्याय Shree Satyanarayan Vrat Katha
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – पंचम अध्याय Shree Satyanarayan Vrat Katha
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