(अहंकार से पतन और श्रद्धा से मोक्ष की अंतिम कथा)
📜 सूतजी का उपदेश
सूतजी बोले—
हे ऋषियों! अब मैं आपको एक और पवित्र कथा सुनाता हूँ। इसे भी आप सभी ध्यान और श्रद्धा से सुनिए, क्योंकि यह कथा अहंकार के त्याग और भक्ति के महत्व को स्पष्ट करती है।
👑 राजा तुंगध्वज और अहंकार का भाव
प्राचीन काल में तुंगध्वज नाम का एक राजा था, जो अपने राज्य के पालन में अत्यंत लीन रहता था। परंतु उसने भी एक समय भगवान के प्रसाद का तिरस्कार किया, जिसके कारण उसे घोर दुःख भोगना पड़ा।
एक बार राजा वन में गया। वहाँ उसने वन्य पशुओं का शिकार किया और थककर एक वटवृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा। उसी स्थान पर उसने ग्वालों को देखा, जो अपने बंधुओं सहित भक्तिभाव से श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन कर रहे थे।
❌ प्रसाद का त्याग और ईश्वरीय अप्रसन्नता
अभिमानवश राजा ने उन्हें देखकर भी पूजन स्थल में प्रवेश नहीं किया, न ही भगवान को नमस्कार किया। ग्वालों ने श्रद्धा से राजा को प्रसाद दिया, परंतु राजा ने न तो प्रसाद ग्रहण किया और न ही सम्मान दिखाया। वह प्रसाद वहीं छोड़कर अपने नगर लौट गया।
🌑 नगर का विनाश और आत्मबोध
जब राजा अपने नगर पहुँचा, तो उसने देखा कि वहाँ सब कुछ नष्ट हो चुका है। यह दृश्य देखकर वह तुरंत समझ गया कि यह सब भगवान सत्यनारायण की अप्रसन्नता का परिणाम है।
पश्चाताप से भरे हृदय के साथ वह पुनः ग्वालों के पास पहुँचा।
🙏 पश्चाताप, पूजा और कृपा
राजा ने इस बार विधिपूर्वक श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन किया और श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया। भगवान उसकी भक्ति और पश्चाताप से प्रसन्न हो गए और उनकी कृपा से राजा का नगर पुनः पहले जैसा हो गया।
राजा ने दीर्घकाल तक सुख और समृद्धि का भोग किया और अंततः मृत्यु के पश्चात स्वर्गलोक को प्राप्त हुआ।
🌼 सत्यनारायण व्रत की महिमा
जो मनुष्य इस परम दुर्लभ श्री सत्यनारायण व्रत को श्रद्धा से करता है, उसे भगवान की विशेष अनुकंपा प्राप्त होती है। निर्धन व्यक्ति धनवान बनता है, भय से मुक्त होकर जीवन जीता है, संतानहीन को संतान सुख प्राप्त होता है और सभी मनोरथ पूर्ण होने पर वह अंतकाल में बैकुंठधाम को प्राप्त करता है।
🔄 पूर्वजन्म और उत्तरजन्म की दिव्य कथा
सूतजी बोले—
अब मैं उन भक्तों की कथा कहता हूँ, जिन्होंने पूर्व जन्म में इस व्रत को किया और अगले जन्म में मोक्ष को प्राप्त किया।
वृद्ध शतानन्द ब्राह्मण ने अगले जन्म में सुदामा के रूप में जन्म लेकर परम गति पाई। लकड़हारे ने निषाद के रूप में जन्म लेकर मोक्ष प्राप्त किया। उल्कामुख नामक राजा दशरथ बनकर बैकुंठधाम को गए। साधु नाम के वैश्य ने मोरध्वज बनकर अपने पुत्र का भी भगवान के लिए बलिदान किया और मोक्ष को प्राप्त किया। महाराज तुंगध्वज ने स्वयंभू रूप में जन्म लेकर भगवान की भक्ति में लीन रहकर कर्म करते हुए मुक्ति पाई।
📿 पंचम अध्याय की पूर्णता
॥ इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पंचम अध्याय संपूर्ण ॥
🙏 मंगल स्मरण
श्रीमन्न नारायण – नारायण – नारायण
भज मन नारायण – नारायण – नारायण
श्री सत्यनारायण भगवान की जय!
अगले अध्याय पढ़ें
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – प्रथम अध्याय Shree Satyanarayan Vrat Katha
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – द्वितीय अध्याय Shree Satyanarayan Vrat Katha
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – तृतीय अध्याय Shree Satyanarayan Vrat Katha
श्री सत्यनारायण व्रत कथा – चतुर्थ अध्याय Shree Satyanarayan Vrat Katha
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