यह प्रार्थना उन साधकों, गायकों और भक्तों की भावनाओं को प्रकट करती है जो अपने सीमित ज्ञान और टूटे शब्दों के बावजूद माँ सरस्वती के चरणों में स्वर, राग और वाणी की मधुरता का वरदान माँगते हैं।
हे स्वर की देवी माँ, वाणी में मधुरता दो।
हम गीत सुनाते हैं, संगीत की शिक्षा दो।
अज्ञान से ग्रसित होकर, क्या गीत सुनाएँ हम।
टूटे हुए शब्दों से, क्या स्वर को सजाएँ हम।
दो ज्ञान और राग माँ तुम, वाणी में मधुरता दो।
सरगम का ज्ञान नहीं, शब्दों में सार नहीं।
तुम्हें आज सुनाने को, मेरी मैया कुछ भी नहीं।
संगीत समंदर से, स्वर-ताल हमें दे दो।
भक्ति में ना शक्ति है, शब्दों का ज्ञान नहीं।
तुम्हें आज सुनाने को, मेरी मैया कुछ भी नहीं।
गीतों के खजाने से, एक गीत हमें दे दो।
जिससे वाणी बने पावन, और हृदय भक्ति से भर दो।
समापन प्रार्थना (Conclusion)
हे माँ सरस्वती, आपकी कृपा से ही शब्दों में अर्थ आता है, स्वर में प्राण बसते हैं और संगीत साधना बनता है। हमारी त्रुटियों को क्षमा कर, हमें इतना सामर्थ्य दो कि हमारी वाणी से निकला हर स्वर आपकी भक्ति और करुणा का संदेश बने।