दुर्गा पूजा भारत का एक प्रमुख और अत्यंत भव्य धार्मिक पर्व है, जिसे विशेष रूप से शक्ति की आराधना के रूप में जाना जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय, अधर्म पर धर्म की स्थापना और नारी शक्ति के सम्मान का प्रतीक है। भारत के कई राज्यों में यह त्योहार अलग-अलग परंपराओं और रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है, लेकिन इसका मूल भाव एक ही है—माँ दुर्गा की उपासना और उनकी कृपा प्राप्त करना। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि दुर्गा पूजा कब मनाई जाती है, क्यों मनाई जाती है, इसका धार्मिक, पौराणिक और सामाजिक महत्व क्या है, और इससे जुड़ी प्रमुख परंपराएँ कौन-सी हैं।
दुर्गा पूजा कब मनाई जाती है?
दुर्गा पूजा मुख्य रूप से आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में मनाई जाती है। यह पर्व शारदीय नवरात्रि के दौरान आता है, जो सामान्यतः सितंबर या अक्टूबर महीने में पड़ता है। नवरात्रि के नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और दसवें दिन विजयादशमी (दशहरा) मनाया जाता है।
विशेष रूप से षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी—ये पाँच दिन दुर्गा पूजा के मुख्य दिन माने जाते हैं।
- षष्ठी: माँ दुर्गा का आह्वान
- सप्तमी: प्राण प्रतिष्ठा और विशेष पूजा
- अष्टमी: महाअष्टमी, सबसे महत्वपूर्ण दिन
- नवमी: महानवमी
- दशमी: विजयादशमी, विसर्जन का दिन
दुर्गा पूजा क्यों मनाई जाती है? Durga Puja Kyu Manaya Jata Hai
दुर्गा पूजा का मूल कारण महिषासुर वध की कथा से जुड़ा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महिषासुर नामक असुर ने कठिन तपस्या कर देवताओं से ऐसा वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे कोई पुरुष, देव या असुर नहीं मार सकता। इस वरदान के अहंकार में वह तीनों लोकों पर अत्याचार करने लगा।
देवताओं की प्रार्थना पर त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश—की शक्तियों से माँ दुर्गा का प्राकट्य हुआ। माँ दुर्गा ने नौ दिनों तक महिषासुर से युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध कर दिया। इसी कारण यह पर्व अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक माना जाता है और दशमी को विजयादशमी कहा जाता है।
शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा का संबंध
दुर्गा पूजा शारदीय नवरात्रि का ही एक विशेष रूप है। भारत के उत्तर और पश्चिमी भागों में नवरात्रि के दौरान व्रत, गरबा और डांडिया अधिक प्रचलित हैं, जबकि पूर्वी भारत—विशेषकर पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और त्रिपुरा—में दुर्गा पूजा भव्य पंडालों और मूर्ति पूजा के रूप में मनाई जाती है।
शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों—शैलपुत्री से लेकर सिद्धिदात्री—की पूजा की जाती है। इन नौ दिनों की साधना का चरम दुर्गा अष्टमी और नवमी को देखने को मिलता है।
दुर्गा पूजा का धार्मिक महत्व
दुर्गा पूजा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आध्यात्मिक साधना का अवसर भी है। माँ दुर्गा को शक्ति, साहस, करुणा और संरक्षण की देवी माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि इस समय माँ धरती पर आती हैं और अपने भक्तों के कष्ट हर लेती हैं।
इस पूजा के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर की नकारात्मक शक्तियों—क्रोध, अहंकार, लोभ और अज्ञान—पर विजय पाने की प्रेरणा लेता है। माँ दुर्गा के दस हाथ, उनके अस्त्र-शस्त्र और सिंह पर विराजमान स्वरूप हमें यह सिखाते हैं कि संतुलन और शक्ति दोनों आवश्यक हैं।
दुर्गा पूजा का पौराणिक इतिहास
दुर्गा पूजा का उल्लेख अनेक पुराणों में मिलता है, जिनमें मार्कण्डेय पुराण और देवी भागवत पुराण प्रमुख हैं। देवी महात्म्य में माँ दुर्गा की महिमा, उनके युद्ध और उनकी कृपा का विस्तार से वर्णन मिलता है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान राम ने भी रावण से युद्ध से पूर्व माँ दुर्गा की पूजा की थी, जिसे अकाल बोधन कहा जाता है। यही कारण है कि शारदीय नवरात्रि में दुर्गा पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
दुर्गा पूजा कैसे मनाई जाती है?
दुर्गा पूजा की तैयारी कई दिन पहले शुरू हो जाती है। बड़े-बड़े पंडाल बनाए जाते हैं, जिनमें माँ दुर्गा की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाती है। पूजा के दौरान ढाक, शंख, घंटे और मंत्रोच्चार से वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
- पुष्पांजलि: भक्त माँ को फूल अर्पित करते हैं
- भोग: खीर, लड्डू, फल और प्रसाद अर्पित किया जाता है
- कुमारी पूजा: कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है
- सिंदूर खेला: दशमी के दिन विवाहित महिलाएँ सिंदूर खेलती हैं
दुर्गा पूजा का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव भी है। यह पर्व लोगों को एक-दूसरे से जोड़ता है। पंडालों की कला, मूर्तिकारों की मेहनत, लोक संगीत और नृत्य—सब मिलकर इसे जन-उत्सव बना देते हैं।
आज के समय में दुर्गा पूजा रोजगार और पर्यटन का भी बड़ा माध्यम बन चुकी है। कारीगरों, कलाकारों और छोटे व्यापारियों को इससे आर्थिक लाभ मिलता है।
दुर्गा पूजा और विजयादशमी का संबंध
दुर्गा पूजा का समापन विजयादशमी के साथ होता है। यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इसी दिन माँ दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है, जो यह दर्शाता है कि माँ अपने लोक वापस जा रही हैं, लेकिन अपने भक्तों को आशीर्वाद देकर।
विजयादशमी के दिन लोग नए कार्य की शुरुआत को शुभ मानते हैं। शस्त्र पूजा, पुस्तक पूजा और व्यापारिक खातों की पूजा भी इसी दिन की जाती है।
दुर्गा पूजा से मिलने वाली सीख
दुर्गा पूजा हमें यह सिखाती है कि शक्ति का सही उपयोग ही सच्ची भक्ति है। यह पर्व नारी सम्मान, आत्मबल और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। माँ दुर्गा का स्वरूप हमें यह याद दिलाता है कि जब अधर्म बढ़ता है, तब शक्ति स्वयं प्रकट होकर संतुलन स्थापित करती है।
निष्कर्ष
दुर्गा पूजा कब और क्यों मनाई जाती है—इसका उत्तर केवल तिथि या पौराणिक कथा तक सीमित नहीं है। यह पर्व आस्था, संस्कृति, समाज और आत्मशक्ति का संगम है। शारदीय नवरात्रि में माँ दुर्गा की आराधना करके भक्त अपने जीवन से नकारात्मकता दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने की कामना करते हैं।
Bhakti Ocean पर ऐसे ही सनातन धर्म से जुड़े लेख आपको भारतीय संस्कृति और भक्ति के गहरे अर्थों से जोड़ते हैं। माँ दुर्गा की कृपा हम सभी पर बनी रहे—यही इस पर्व का सार है। 🙏