शिव प्रदोष व्रत कथा | Shiv Pradosh Vrat Katha (भगवान शिव की कृपा का व्रत)

प्राचीन समय की बात है। एक नगर में भगवान शिव का परम भक्त एक निर्धन पुजारी निवास करता था। जीवन अत्यंत साधारण था, पर भक्ति में कोई कमी नहीं थी। दुर्भाग्यवश एक दिन उस पुजारी का देहांत हो गया। उसके बाद उसकी पत्नी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। वह अपने छोटे पुत्र को साथ लेकर जीवन-यापन के लिए प्रतिदिन भिक्षा माँगती और संध्या होते-होते थकी-हारी घर लौट आती।

एक दिन मार्ग में उसकी भेंट विदर्भ देश के एक युवा से हुई। वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि विदर्भ का राजकुमार था। पिता की मृत्यु के बाद राज्य छिन जाने से वह दर-दर भटक रहा था। उसकी दयनीय अवस्था देखकर पुजारी की विधवा का हृदय करुणा से भर आया। उसने उस राजकुमार को अपने साथ घर ले जाकर अपने पुत्र के समान आश्रय दिया।

कुछ समय पश्चात वह महिला अपने पुत्र और उस राजकुमार को लेकर महर्षि शांडिल्य के आश्रम पहुँची। वहाँ ऋषि ने उन्हें भगवान शिव के पावन प्रदोष व्रत की कथा, विधि और महत्व का विस्तार से वर्णन किया। उस दिन से पुजारी की पत्नी ने पूरे श्रद्धा-भाव से प्रदोष व्रत का पालन प्रारंभ कर दिया।

एक दिन दोनों बालक वन में भ्रमण के लिए निकले। पुजारी का पुत्र तो समय पर घर लौट आया, किंतु राजकुमार वहीं रुक गया। वन में उसने कुछ गंधर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते देखा। उनसे संवाद के दौरान उसकी दृष्टि एक दिव्य कन्या पर पड़ी, जिसका नाम अंशुमती था। उसी कारण वह उस दिन घर देर से लौटा।

अगले दिन राजकुमार पुनः उसी स्थान पर पहुँचा। वहाँ उसने अंशुमती को अपने माता-पिता से बात करते देखा। तभी गंधर्व दंपत्ति ने उस युवक को पहचान लिया और कहा,
“तुम विदर्भ के राजकुमार धर्मगुप्त हो, क्या यह सत्य नहीं?”

राजकुमार ने विनम्रता से सत्य स्वीकार कर लिया। उसके संस्कार, तेज और शील से प्रसन्न होकर गंधर्व दंपत्ति ने कहा कि भगवान शिव की कृपा से वे अपनी पुत्री अंशुमती का विवाह उससे करना चाहते हैं। राजकुमार ने इसे शिव की इच्छा मानकर सहर्ष स्वीकार कर लिया और विधि-विधान से उनका विवाह संपन्न हुआ।

विवाह के पश्चात गंधर्व सेना की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ पर आक्रमण किया और भीषण युद्ध के बाद अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। वह अंशुमती के साथ राजसिंहासन पर विराजमान हुआ। राजमहल में उसने उस पुजारी की विधवा पत्नी और उसके पुत्र को ससम्मान स्थान दिया। शिव कृपा से उनके सारे कष्ट और दरिद्रता समाप्त हो गई और वे सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।

एक दिन रानी अंशुमती ने राजकुमार से पूछा कि उसके जीवन में यह अद्भुत परिवर्तन कैसे संभव हुआ। तब राजकुमार ने अपने संघर्ष की पूरी कथा सुनाई और बताया कि यह सब भगवान शिव के प्रदोष व्रत का ही प्रतिफल है, जिसे पुजारी की पत्नी श्रद्धा से करती रही।

उसी समय से प्रदोष व्रत की महिमा चारों ओर फैलने लगी। मान्यता है कि इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं, कष्ट दूर होते हैं और जीवन में इच्छित फल की प्राप्ति होती है। आज भी अनेक स्थानों पर स्त्री और पुरुष समान श्रद्धा से इस व्रत का पालन करते हैं।

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